Sunday, July 10, 2016
Thursday, July 7, 2016
ये वो कली है जो अब मुरझाने लगी है..
कश्ती समंदर को ठुकराने लगी है..
तुमसे भी बगावत की बू आने लगी है..
मत पूछिए क्या शहर में चर्चा है इन दिनों..
मुर्दों की शक्ल फिर से मुस्कुराने लगी है..
मैं सोचता हूँ इन चबूतरों पे बैठ कर..
गलियाँ बदल-बदल के क्यूँ वो जाने लगी है..
गुजरे हुए उस वक़्त की बेशर्मी मिली थी कल..
वो आज की हया से भी शर्माने लगी है..
किस चीज को कहूँ अब इंसान बताओ..
ये वो कली है जो अब मुरझाने लगी है..
-सोनित
Tuesday, June 28, 2016
तुम भी तो इक माँ हो आखिर..
जैसे गोरे गालों पर माँ काला टीका करती थी..
तुमने काली रातों में इक उजला चांद सजाया है..
तुम भी तो इक माँ हो आखिर..
– सोनित
Tuesday, June 14, 2016
ऊंचाई की कीमत
अब मुझको बढ़ जाना है ऊपर तक चढ़ जाना है
बेल बोलती बरगद तेरी संगत में पड़ जाना है
पंछी तुझसे बातें करते बादल करते तुझे सलाम
चूं-चूं चीं-चीं खट पट-खट पट
जब जब घिरने आती शाम
मुझको भी हर शाम चौकड़ी मिलकर खूब जमाना है
बेल बोलती बरगद तेरी संगत में पड़ जाना है
बारिश की हर बूँद ठहरकर तुझसे हाथ मिलाती है
मंद पवन भी हौले हौले तेरी शाख हिलती है
तुम पूजा के पात्र बने हो मुझको भी बन जाना है
बेल बोलती बरगद तेरी संगत में पड़ जाना है
बेल बखान सुना बूढ़े बरगद ने लम्बी सांस भरी
बोला बेल सुनो अब मेरी बातें सच्ची और खरी
देखा तुमने कद मेरा और मेरी पत्ती हरी भरी
शान-ओ-शौकत इज्जत सब पर बात न तुमको ध्यान पड़ी
कितनी ही विपदाएं मुझको लगभग रोज उठाना है
बरगद कहता बेल तुम्हे भी काफी कुछ समझाना है
मंद हवाएं दिखी तुम्हे पर क़्यूं न तुम्हे तूफ़ान दिखा
सम्मान दिखा बूँदों का पर न ओलों का अपमान दिखा
दिखी शाम की मंडलियां..पर दोपहरी का सूनापन??
तुम जिस छाँव तले बैठी हो उसकी खातिर जलता तन??
इस ऊंचाई की कीमत मुझको हर रोज चुकाना है
बरगद कहता बेल तुम्हे भी काफी कुछ समझाना है
सुनकर बोली बेल सुनो है सब शर्तें मुझको स्वीकार
मुझको बस चढ़ जाने दो फिर देखो मेरा तुम विस्तार
आज तुम्हारी छाव तले पर कल फिर साथ चलूंगी मैं
नहीं जलोगे तुम्ही अकेले पल-पल साथ जलूँगी मैं
बस ऊँचा उठना है फिर चाहे हर कष्ट उठाना है
बेल बोलती बरगद तेरी संगत में पड़ जाना है.
- सोनित
बेल बोलती बरगद तेरी संगत में पड़ जाना है
पंछी तुझसे बातें करते बादल करते तुझे सलाम
चूं-चूं चीं-चीं खट पट-खट पट
जब जब घिरने आती शाम
मुझको भी हर शाम चौकड़ी मिलकर खूब जमाना है
बेल बोलती बरगद तेरी संगत में पड़ जाना है
बारिश की हर बूँद ठहरकर तुझसे हाथ मिलाती है
मंद पवन भी हौले हौले तेरी शाख हिलती है
तुम पूजा के पात्र बने हो मुझको भी बन जाना है
बेल बोलती बरगद तेरी संगत में पड़ जाना है
बेल बखान सुना बूढ़े बरगद ने लम्बी सांस भरी
बोला बेल सुनो अब मेरी बातें सच्ची और खरी
देखा तुमने कद मेरा और मेरी पत्ती हरी भरी
शान-ओ-शौकत इज्जत सब पर बात न तुमको ध्यान पड़ी
कितनी ही विपदाएं मुझको लगभग रोज उठाना है
बरगद कहता बेल तुम्हे भी काफी कुछ समझाना है
मंद हवाएं दिखी तुम्हे पर क़्यूं न तुम्हे तूफ़ान दिखा
सम्मान दिखा बूँदों का पर न ओलों का अपमान दिखा
दिखी शाम की मंडलियां..पर दोपहरी का सूनापन??
तुम जिस छाँव तले बैठी हो उसकी खातिर जलता तन??
इस ऊंचाई की कीमत मुझको हर रोज चुकाना है
बरगद कहता बेल तुम्हे भी काफी कुछ समझाना है
सुनकर बोली बेल सुनो है सब शर्तें मुझको स्वीकार
मुझको बस चढ़ जाने दो फिर देखो मेरा तुम विस्तार
आज तुम्हारी छाव तले पर कल फिर साथ चलूंगी मैं
नहीं जलोगे तुम्ही अकेले पल-पल साथ जलूँगी मैं
बस ऊँचा उठना है फिर चाहे हर कष्ट उठाना है
बेल बोलती बरगद तेरी संगत में पड़ जाना है.
- सोनित
Wednesday, June 1, 2016
सिलवटें जाती नहीं..
नींद
भी आती नहीं.. रात भी जाती नही..
कोशिशें
इन करवटों की.. रंग कुछ लाती नहीं..
चादरों
की सिलवटों सी हो गई
है जिंदगी..
लोग
आते.. लोग जाते.. सिलवटें जाती नहीं..
जुगनुओं
के साथ काटी आज सारी रात
मैंने..
राह
तेरी भी तकी..
पर तुम कभी आती नहीं..
कुछ
शब्द छोड़े आज मैंने रात
की खामोशियों में..
मैं
जो कह पाता नहीं..
तुम जो सुन पाती
नहीं..
- सोनित
Saturday, May 28, 2016
"किताब का फूल"
अब घर कि हर एक चीज बदल दी मैने ..
सिक्कों को भी नोटों से बदल बैठा हूं..
पर उस फूल का क्या जो किसी ईक धूल पड़ी..
मैने किताब में बरसों से दबा रक्खा है..
जिसे दुनिया कि भीड़ से कभी तन्हा होकर..
मैं , किताब खोल देख लिया करता हूं..
वो उस फूल के मानिंन्द तो नहीं जिसको..
यूं ही कलियों को झटक तोड़ दिया करता हूं..
जो खुद ओंस की बूंदों से अनभिगा है पर..
जिसको देखे से ये पलकें भी भीग जाती है..
जिसकी खुसबू सिमट के रह गई है पन्नों
में..
फ़िर भी, लांघ के सागर के पार जाती है..
युं हि चौंका न करो बैठ के तन्हाई में..
जो अचानक से तुम्हें मेरी याद आती
है..
तुम्हि बतओ भला कैसे बदल दूं उसको..
वो जो ,मेरी खुशियों को इक सहारा है..
तेरे गुलशन में फ़ूल उस्से कई उम्दा हैं..
मेरि गर्दिश का मगर वो हि इक सितारा है..
माफ़ करना वो फूल मैं नही बदल सकता..
माफ़ करना..कि मैं नही बदल सकता...
-सोनित
Thursday, May 26, 2016
अब सिर्फ एक तागा टूटेगा..
आज
उस पुराने झूले
को देखकर कुछ बातें याद आ गयी..
कई बरस
गुजरे जब वो नया
था.. उसकी रस्सियाँ चमकदार थी.. उनमे आकर्षण था..
उन
रस्सियों का हर तागा
बिलकुल अलग दिखाई देता था..
उस
'हम' में भी अपने 'अहम'
को सम्हाले हुए..
उनमे
चिकनाहट थी..और उन्हें पकड़ने
का सलीका था..
आज
बहुत बरस गुजर चुके हैं उस बात को..
झूला
भी पुराना हो गया है..
रस्सियाँ भी कमजोर मालूम
पड़ती हैं..
अब
रस्सियों में न वो चमक
है.. न वो आकर्षण..
पर
जब इन रस्सियों के
तागों को देखता हूँ..
इन्हे
अलग करना भी मुश्किल मालूम
पड़ता है..
वक़्त
के साथ एक दुसरे से
रगड़ खाते जैसे ये एक हो
गए हैं..
वक़्त
की चक्की में पिस गया है अहम शायद..और बच गया
है हम..
माना
की वक़्त की मार से
अब रस्सी कमजोर हो गयी है..
पर
अब अनेक तागों वाली रस्सी नहीं..
अब
सिर्फ एक तागा टूटेगा..
- सोनित
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