Saturday, January 7, 2012

चंद शेर-ओ-शायरी...


i )  "तुम्हे जिन्दगी से शिकायत बहुत है..मगर मौत भी बेरहम कम नहीं...
    जिन्हें जिस्म ढकना मुनासिब नहीं..यही मौत उनसे कफ़न मांगती है..."

ii) "किस्मत का रोना क्यूँ रोऊँ..मै बशर खुदा का बच्चा हूँ...
     जिस ओर सफ़र में मुड जाऊं..उस ओर सड़क मुड जाएगी..."

iii) "अब जाना क्यूँ दीवानों को दुनिया परवाना कहती है...
    हमने सौ बार मोहब्बत की..हम सौ बार जले यारों..."

iv)"जहाँ में आफतें सौ और इक आफत जिगर में है...
   मगर सौ झेलना आसां यहाँ इक झेलना मुश्किल..."

v)"किसी से क्या हिमायत की करूँ दरकार मै साहब...
  बशर खुद्दार को खुद सा कोई काबिल नहीं दिखता...
  खुदा  ईमान  खुद्दारी  इन्ही  से  बात  होती  है...
  मुझे अपनों में कोई और तो शामिल नहीं दिखता..."

vi)"मैकदों में मैकशों की भीड़ दिखना आम है...
   इस कदर पी आज इंसा की शराफत पी उठे...
   मौत से जाकर लिपटना फितरते-बुजदिल रही...
  इस कदर जी मौत भी तुझसे लिपटकर जी उठे..."

vii)"इक दिन आऊंगा खूब नशा तेरे लब का कर जाऊंगा...
    नजरों में क्या पागल तेरे मै ख्वाबों में बस जाऊंगा...
   कुछ देर ठहर जा और अभी वो वक़्त जरा आ जाने दे...
   तब तक मुझको इस पास खड़े मैखाने में ही जाने दे..."

viii)"बुरा क्या था अगर इस दर्द के मै साथ में दिलबर...
     तुम्हारी याद भी चलकर मिटा लेता अगर थोड़ी... 
     दवाखाने में क्यूँ छोड़ा जरा चलते तो मैखाने...
     दावा के साथ में दारू चडा लेता बशर थोड़ी..."

ix)"कलेजा तो हमारा है..मगर तुम चीर के देखो... 
    यहाँ हर खून का कतरा तुम्ही से प्यार करता है...
    बगावत इस कदर यारों ज़माने में नहीं देखी...
    मनाओ लाख पर हरक़त वही सौ बार करता है..."

x)"तुम्हारी याद में हर पल हरिक लम्हा जिया हूँ मै...
   इसी तरह बिता दी इस बशर ने जिन्दगी सारी...
   न पूछो क्या मोहब्बत का हुआ मुझपे असर यारों...
खुदा  प्यारा  ज़माने  को.. मुझे  बस  बंदगी  प्यारी..."

              और अंत में...
 "हुकुम कर के चले वो ऐ बशर तू भूल जा मुझको...
रसूलों से मोहब्बत की तेरी औकात ही क्या है...
मगर हम भी मोहब्बत के बड़े पक्के खिलाडी हैं... 
खुदा  को  मात देते  है .. तुम्हारी  बात  ही  क्या  है..."
                                                                                      -सोनित 

Friday, October 7, 2011

अकेला था तो मैं इस भीड़ में खोने से डरता था...


अकेला था तो मैं इस भीड़ में खोने से डरता था...
अभी तू साथ है मेरे..तुझे खोने से डरता हूँ...

कहाँ कल तक हमें बस फ़िक्र अपने आसुओं की थी...
कहाँ अब आजकल मैं बस तेरे रोने से डरता हूँ...

तुझे जब भूलना चाहूं तो तेरे ख्वाब आते है...
मुझे भी नींद आती है..मगर सोने से डरता हूँ...

तुझे पाने की चाहत में जिया हर एक लम्हा है...
मगर मजबूर हूँ कितना..तेरा होने से डरता हूँ...
                                                                                        -सोनित

Saturday, August 13, 2011

जश्न-ए-आजादी में "इन भारतीयों" को न भूलना...

जय हिंद ...
           

        यहाँ जिस्म ढकने की जद्दोजहद में...
        मरते हैं लाखों... कफ़न सीते सीते...

 
जरा गौर से उनके चेहरों को देखो...
हसते हैं कैसे जहर पीते पीते...



             वो अपने हक से मुखातिब नहीं हैं...
         नहीं बात ऐसी जरा भी नहीं है...
        उन्हें ऐसे जीने की आदत पड़ी है...
         यहाँ जिन्दगी सौ बरस जीते जीते...


 
                 
                                                                            कल देश में हर जगह जश्न होगा...
वादे तुम्हारे समां बांध देंगे...






 
मगर मुफलिसों की बड़ी भीड़ कल भी...
 खड़ी ही रहेगी तपन सहते सहते...
                                      
                              "जय हिंद"-सोनित 

Wednesday, August 10, 2011

वक़्त कैसा आ गया है, इस सफर में देखिये...


वक़्त कैसा आ गया है, इस सफर में देखिये...
जिंदगी हर मौत की शौकीन लगती है...
तूने बनाई थी बड़ी हमदर्द ये दुनिया...
संगदिल ये क्यूँ मुझे संगीन लगती है...

आंसुओ का हर तरफ़ सैलाब उमड़ा है...
दिल मगर बंजर कहाँ तक पीर भरती है...
मेरी पलकों पर लदा हर बोझ कड़वा है...
गैर पलकों की नमीं नमकीन लगती है...

दर्द से बेबस भले तिल-तिल तड़पता हो...
हर तमाशे पे यहाँ पर भीड़ लगती है...
और गलियों में मोहल्लों में वही चर्चा...
क्यूँ दर्द की हर दास्तां रंगीन लगाती है...

Sunday, August 7, 2011

मैं रोज नशा करता हूँ... गम रोज गलत होता है...


इक हाथ सम्हलती बोतल...
दूजे में ख़त होता है...
मैं रोज नशा करता हूँ...
गम रोज गलत होता है...

तरकश पे तीर चड़ाकर... 
बेचूक निशाना साधूँ...
उस वक्त गुजरना उनका... 
हर तीर गलत होता है...

मिटटी के खिलौने रचकर...
फिर प्यार पलाने वाली...
गलती तो खुदा करता है...
इन्सान गलत होता है...

तुम जश्न कहो या मातम...
हर रोज मनाता हूँ मैं...
मैं रोज नशा करता हूँ...
गम रोज गलत होता है...
                     - सोनित

Saturday, August 6, 2011

हमनजर हो जाइये या हमसफ़र हो जाइये...

हमनजर हो जाइये या हमसफ़र हो जाइये...

आज हमसे मिल के अब शाम-ओ-सहर हो जाइये...

तेरे बिन चारों तरफ कैसा अँधेरा छा गया...

इस अँधेरी रात में आ दोपहर हो जाइये...

तू गया तड़पा हूँ तबसे तेरी बाँहों के लिए...

जो भरे आघोष में ऐसी लहर हो जाइये...

या बसा दे ये जहाँ आकर के मेरे पास में...

छीन ले या जिन्दगी ऐसा कहर हो जाइये...
                                                             -सोनित 

Friday, August 5, 2011

kabhi kiwad se parde to hata kar dekho...

tere deedar me tallin najar aayenge...
kabhi kiwad se parde to hata kar dekho...

bina tar tere pas chale aayenge...
kabhi rahon pe ye palken to bicha kar dekho...

teri aahat se hi pahchan tujhe jayenge...
kabhi pallu se apni sakl chupa kar dekho...

bade jidhdhi hain...syahi se utar jayenge...
kabhi kagaj pe likho aur mita kar dekho...

main rahunga...tere saye to chale jayenge...
kabhi sham ko shamma to bujh kar dekho...
                                                                  -sonit